रानी जवाहर बाई कौन थी, जल्दी से जानें
पर्सनालिटी (PERSONALITY)

रानी जवाहर बाई कौन थी, जल्दी से जानें

Rani jawahar bai kaun thi, jaldi se jane

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सन् 1533 में गुजरात के बादशाह बहादुरशाह जफर ने अपनी बहुत बड़ी सेना के साथ चितौड़ पर आक्रमण कर दिया था। उस समय विक्रमादित्य चितौड़ की गद्दी पर थे। रानी जवाहर बाई विक्रमादित्य की रानी थी। विक्रमादित्य चितौड़ के कायर राजा थे और उनकी कायरता की वजह से सबको चिंता होने लगी थी कि अब चितौड़ को कौन संभालेगा। सिसौदिया कुल की रक्षा कैसे होगी, कैसे राजपूत स्वदेश की रक्षा कर सकेंगे?

इस चिंता से सब चिंतित थे, ऐसे में देवलिया प्रतापगढ़ के रावल बाधगी अपनी राजधानी से लौटे तो वो राणा के साथ लड़ाई के लिए तैयार हो गए। उनकी मौजूदगी में सब राजपूत वीरता के साथ युद्ध के लिए तैयार हो गए। हालांकि मुसलामानों की सेना राजपूतों की सेना के मुकाबले अधिक थी, लेकिन फिर भी राजपूत पीछे नहीं हटे।

सबने शपथ खायी कि अगर लड़ेंगे तो विजय प्राप्त करके आएंगे वरना वीरगति को प्राप्त हो जाएंगे। युद्ध शुरू होते ही बहादुर शाह ने पहले अपनी तोपों से वार किया लेकिन तब भी राजपूत पीछे नहीं हटे और उस आवाज को सुनकर गोले की तरफ तीर को छोड़ने लगे।

उस समय तोपें इतनी प्रभावशाली नहीं थी इसलिए बहादुरशाह के सैनिकों को बंदूकें भी चलानी पड़ी। बदूंकों और तोपों के धुएं ने पूरी रणस्थल में अँधेरा कर दिया। दोनों पक्षों के काफी सैनिक मारे गए, लेकिन फिर भी बहादुरशाह चितौड़ पर कब्जा न कर सका।

आखिर में बहादुरशाह ने किले की एक ओर की दीवार को ढेरों बारूदों से उड़ाने का फैसला लिया। जो भाग बारूदी सुरंग से उडाया गया था हाड़ा वीर अर्जुनराव अपने पांच सौ सैनिकों के साथ युद्ध कर रहे थे। ऐसे में वो अपने सभी सैनिकों के साथ मारे गए। फिर शत्रु भग्न दुर्ग के भीतर घुसने के लिए तैयार हो गए, लेकिन फिर भी चित्तौड़ राजपूतों के हाथ में था।

कई सामंत और सैनिक शत्रुओं के सामने दृण और एक संकल्प के साथ खड़े रहे। लाख कोशिशों के साथ भी शत्रु उन्हें हरा न सके, अपनी सूझभूझ से वो शत्रु को रोकते रहें, परन्तु रह गए राजपूत कब तक सेना को रोककर रखते।

वीरता के साथ जब सैनिक लड़ते-लड़ते कम हो गए तो बहादुरशाह के सैनिक किले में घुसने लगे। लेकिन आगे जाकर सैनिक एक जगह ठहर गए और एक टूक सामने की ओर देखने लगी। सामने रानी जवाहर बाई हाथ में भाला लिए, प्रचंड रूप धारण किए कड़ी हुई थी।

रानी जवाहर बाई ने जब हाड़ाओ के मर जाने की खबर सुनी थी, तो उनके मन में यही आया कि ये खबर सुनकर राजपूत निराश और साहसहीन हो जाएंगे। ऐसे में चितौड़ का बचना बेहद मुश्किल था। जवाहर बाई ने कवच धारण किया और घमासान हो रहा था। योद्धाओं को लड़ता हुआ देख वो खुद भी मैदान में लड़ाई करने के लिए उतर गई।

रानी जवाहर बाई के साहस को देखकर राजपूतों में भी साहस जगा। उन्होंने भी ऐसी हिम्मत दिखाई कि यवनों को पीछे हटना पड़ा। रानी जवाहर बाई के सामने यो यवन आता, वहीं उसे भाले से मार दिया जाता।

कई यवन एक साथ आगे आने लगे, लेकिन फिर भी वीर बहादुरी निरूत्साहित न हुई। दूर खड़ा बहादुरशाह बेहद चकित रह गया। सबने इनकी बहादुरी के बारे में सुना तो था, लेकिन इस रूप में मारकाट मचाते हुए पहली बार देखा था। रणभूमि में धड़ व सिर कटके गिर रहे थे, उसी समय रानी जवाहर बाई के शरीर में तोप का एक गोला आकर लगता है और वहीं फट गया। ऐसे ही रानी जवाहर बाई वीरगति को प्राप्त हुई।