रानी लक्ष्मीबाई की जीवनी के बारे में जानें (Rani lakshmi bai ki jeevani ke bare me jane)


भारतीय वसुंधरा को गौरवान्वित करने वाली झांसी की रानी की कहानी आप लोगों को बेहद कम पता होंगी इस लेख में हम आपको बताते हैं झांसी की रानी की जीवनी के बारे में।

परिचय -

महारानी लक्ष्मीबाई का जन्म काशी में 19 नवंबर 1835 को हुआ था।

बनी झांसी की रानी -

मनुबाई बचपन से ही शस्त्र और शास्त्र, जानती थी, उन्होंने बचपन में ही दोनों के बारे में शिक्षा ली थी। ये सब देखकर लोग उन्हें छबीली के नाम से भी पुकारने लगे थे। विवाह के बाद उनका नाम लक्ष्मीबाई रखा गया।

नहीं सह पाए पुत्र खोने का दुख -

लक्ष्मीबाई ने जब एक पुत्र को जन्म दिया तो उनके पुत्र की मृत्यु चार महीने बाद ही हो गयी। पुत्र खोने का दुख राजा को इस कदर लगा कि वो अस्वस्थ रहने लगे कि उनकी मृत्यु हो गयी। लक्ष्मीबाई ने एक पुत्र को भी गोद लिया था जिसका नाम दामोदार राव रखा गया था।

झांसी मेरी है -

राजा के मरने के बाद झांसी शोक में डूब गयी और राजा ने ऐसे में कूटनीतिक चाल चली और झांसी को कब्ज़े में लेने की ठान ली। रानी भी पीछे नहीं हटी उन्होंने अंग्रेज़ों को साफ बोल दिया झांसी मैं किसी को नहीं दूंगी। लेकिन फिर विद्रोहियों ने झांसी पर कब्ज़ा कर लिया

61 अंग्रेजों को अपने सामने टिकने नहीं दिया -

ये लड़ाई काफी लम्बे समय तक चली, जिसमें बड़े बड़े सैनिक मारे गए। कई कैप्टेन ऐसे थे जिहोने बागियों के सामने खुद को समर्पित कर दिया। इसी दिन 61 अंग्रेजों को रानी ने मौत के घात उतार दिया।

सत्ता को संभालने की ज़िम्मेदारी संभाली -

इतना सब कुछ होने के बाद महारानी ने झांसी राज्य का प्रशासन संभाला, उनके पास करीब एक साल तक रहा। जनरल ह्यूरो़ज 21 मार्च 1858 को झांसी आने से रानी के साथ 3 अप्रैल तक उसका काफी बड़ा युद्ध चला।

अंग्रेजों के हाथों से बच निकलीं -

युद्ध जब काफी बढ़ गया था तो रानी ने सामने से लड़ने की ठानी और दत्तक पुत्र को पीठ पर बांधकर घोड़े पर बैठकर बिना डरे युद्ध के लिए निकल गयी। अपने सलाहकारों की सलाह मानकर 03 अप्रैल 1858 को रानी आधी रात को घुड़सवारों के साथ कालपी की और निकल गयी। अंग्रेजी सैनिको ने उनका खूब पीछा किया फिर भी वो हाथ नहीं आयी। महारानी ग्वालियर पहुंची तो उनका युद्ध वहां पहुंचकर अंग्रेज़ों के साथ फिर से हुआ।

वीरगति को प्राप्त हुई महारानी -

झांसी की रानी दामोदर राव को रामचन्द्र देशमुख को सौंपकर अंग्रेज़ों से लड़ने के लिए चली गयी, लेकिन जब वो युद्ध के लिए आगे बढ़ रही थी तो सोनरेखा नाले को पार करने में उनका घोड़ा असमर्थ रहा और पीछे से अंग्रेजी सैनिक ने उनके ऊपर तलवार से हमला कर दिया। ऐसे में उन्हें काफी चोट आयी और वे 23 वर्ष की आयु में वे वीरगति को प्राप्त हुई।


क्या ये लेख आपके लिए उपयोगी है?

हां नहीं  

सम्बंधित लेख